चेन्नई, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी की ओर से अपने पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (आरएलवी) के नवंबर या दिसंबर 2020 में जमीन पर उतरने का परीक्षण करने की संभावना है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) कक्षा के उपग्रहों में भेजने और अगले मिशन के लिए वापस आने के लिए अमेरिका के स्पेस शटल के समान आरएलवी बनाने का लक्ष्य बना रहा है। यह उपग्रह प्रक्षेपण लागत को भी कम करेगा।
सेवा में दो भारतीय रॉकेट-पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) और जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएसवी) और आने वाले स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) हैं।
इसरो के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) के निदेशक एस. सोमनाथ ने आईएएनएस से कहा, हम कर्नाटक में चित्रदुर्ग जिले में पुन: प्रयोज्य लॉन्च वाहन की लैंडिंग का परीक्षण करने की योजना बना रहे हैं। हम इस वर्ष नवंबर/दिसंबर में परीक्षण करना चाहते हैं।
योजना के अनुसार, आरएलवी को एक हेलीकॉप्टर द्वारा उठाया जाएगा और चार किमी की ऊंचाई से इसे छोड़ा जाएगा।
सोमनाथ ने कहा कि हेलीकॉप्टर द्वारा इसे छोड़े जाने के बाद आरएलवी अपने पैराशूट को तैनात करते हुए चित्रदुर्ग जिले के एक हवाई क्षेत्र में हवाई पट्टी पर लैंड करेगा।
इसरो के अनुसार, हेलीकॉप्टर के साथ इंटरफेस करने के लिए आरएलवी इंटरफेस सिस्टम (आरआईएस) और लैंडिंग गियर का क्वालिफिकेशन मॉडल सिद्ध हुआ है।
सीधे शब्दों में कहें तो आरएलवी एक कक्षा में चढ़ेगा, वहां रहेगा, एक विमान की तरह रनवे पर फिर से प्रवेश करते हुए लैंड करेगा। प्रौद्योगिकी में दोनों की जटिलताओं को पूरा करने की चुनौतियां हैं-एक रॉकेट और एक विमान।
सोमनाथ के अनुसार, इसरो के लगभग 30-40 अधिकारियों को चित्रदुर्ग ले जाना है और उन्हें लगभग दो सप्ताह तक वहां रहना है।
2016 में इसरो ने आरएलवी पीढ़ी के यान का 65 किलोमीटर की ऊंचाई से सफलतापूर्वक परीक्षण किया था।
एकेके/एएनएम
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RACHNA SAROVAR
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