डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सीबीएसई ने 10वीं कक्षा के छात्रों को राहत देते हुए सामाजिक विज्ञान सिलेबस कम कर दिया है। सीबीएसई ने 10वीं की बोर्ड परीक्षा में छात्रों की सहूलियत के मद्देनजर सिलेबस में यह कटौती की है। रिवाइज्ड किया गया सिलेबस सीबीएसई की आधिकारिक वेबसाइट पर देखा जा सकता है।
27 मई को होगा 10वीं का सामाजिक विज्ञान का पेपर
10वीं कक्षा में सामाजिक विज्ञान विषय के अंतर्गत इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं। सीबीएसई 10वीं का सामाजिक विज्ञान का बोर्ड टेस्ट पेपर 27 मई को आयोजित किया जाएगा। सामाजिक विज्ञान थ्योरी के टॉपिक्स से छात्रों के लिए पांच यूनिट हटाई गईं हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक कोरोना महामारी के कारण इस साल स्कूल काफी कम दिन खुले। अधिकांश छात्रों को ऑनलाइन माध्यमों से ही शिक्षा प्रदान की गई है। ऐसे में अब स्वयं छात्र, अभिभावक और शिक्षक भी छात्रों के पाठ्यक्रम को कम किए जाने किए जाने के पक्ष में हैं।
सिलेबस कम करने को कह चुके हैं केंद्रीय शिक्षा मंत्री
इससे पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक कह चुके हैं, कोरोना के कारण पूरे देश में उत्पन्न हुए असाधारण स्थिति को देखते हुए सीबीएसई को सलाह दी गई है कि वह अपने पाठ्यक्रम का पुनर्निधारण करें और सिलेबस को कम किया जाए।
30 प्रतिशत तक घटाया सिलेबस
केंद्रीय शिक्षा मंत्री द्वारा सिलेबस को कम किए जाने का निर्देश देने के बाद सीबीएसई ने विभिन्न विषयों में 30 फीसदी तक सिलेबस घटाया था। वह पाठ्यक्रम अब होने वाली बोर्ड परीक्षाओं और आतंरिक मुल्यांकन के लिए निर्धारित विषयों का हिस्सा नहीं होगा।
1500 से ज्यादा शिक्षाविदों ने दिए सुझाव
विद्यालय प्रमुख और अध्यापक विभिन्न विषय संयोजित करने के लिए विद्यार्थियों को घटाई गई विषय-वस्तु की भी व्याख्या करना सुनिश्चित करेंगे। संशोधित पाठ्यक्रम सीबीएसई की शैक्षणिक वेबसाइट पर उपलब्ध है। शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक कोरोना महामारी के मद्देनजर पूरे देश के शिक्षाविदों से सिलेबस में कटौती के विषय पर ठोस सुझाव आमंत्रित किए गए थे। इस विषय पर देशभर के 15 सौ से अधिक शिक्षाविदों ने अपने सुझाव भेजे हैं।
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अखरोट को दुनिया भर में सुपरफूड माना जाता है। ये ओमेगा-3 फैटी एसिड, अल्फा-लिनोलेइक एसिड, फाइबर, प्रोटीन, कॉपर से भरपूर होते हैं। इसके अलावा, अखरोट में एंटीऑक्सिडेंट, बायोटिन, मैंगनीज, मोलिब्डेनम, विटामिन ई और बी6 भी होता है। ऐसे में अगर आप अखरोट को अपनी डाइट में शामिल करते हैं तो इसके कई सारे हेल्थ बेनिफिट देखने को मिल सकते हैं। आज हम आपको इनके कुछ हेल्थ बिनिफिट बताने जा रहे हैं।
ब्रेन हेल्थ और मेमोरी को बूस्ट करता है
अखरोट को ब्रेन फूड भी कहा जाता है। यह फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स और अनसैचुरेटेड फैट का बेहतरीन स्त्रोत है। यह मस्तिष्क के लिए बहुत फायदेमंद है। ओमेगा- 3 फैटी एसिड से समृद्ध भोजन खाने से तंत्रिका तंत्र सुचारु रूप से काम करता है और याद्दाश्त में सुधार करता है। इससे स्मरण शक्ति और एकाग्रता बेहतर होती है और बुढ़ापे में कमजोर याद्दाश्त को खत्म करने में सक्षम है।

हृदय के लिए फायदेमेंद
अखरोट में बहुत सारे पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड होते हैं। अखरोट में ओमेगा फैटी एसिड ज्यादा मात्रा में पाया जाता है, जिसके कारण यह कार्डियोवैस्कूलर सिस्टम के लिए बहुत लाभकारी होता है। ओमेगा 3 फैटी एसिड शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाते हैं जो कि हृदय के लिए फायदेमंद है। यह भी पाया गया है कि रोजाना केवल कुछ अखरोट खाने से ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद मिल सकती है, इसलिए हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों को इसका सेवन जरूर करना चाहिए।

डिप्रेशन का खतरा कम
एक अध्ययन के मुताबिक अखरोट खाने से अवसाद यानी डिप्रेशन का खतरा कम हो जाता है और एकाग्रता का स्तर बेहतर होता है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अखरोट खाने वाले लोगों में अवसाद का स्तर 26 प्रतिशत कम, जबकि इस तरह की अन्य चीजें खाने वालों में अवसाद का स्तर 8 प्रतिशत कम पाया है। इसके अलावा, अखरोट में विटामिन ई, बी 6, फोलेट और एलाजिक एसिड आपके नर्वस सिस्टम को नॉरिश करता है।

इम्यूनिटी बूस्टर
अखरोट एक इम्यूनिटी बूस्टर भी है। इसके एंटीऑक्सीडेंट तत्व आपके इम्यून सिस्टम को मज़बूत करने के साथ साथ आपको हेल्दी और फिट बनाए रखते हैं। इसके अलावा, अखरोट आपके ब्लड शुगर को नियंत्रित रखता है, बोन हेल्थ को बूस्ट करत है, त्वचा, बालों को पोषण देता है, कैंसर से बचाता है।

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। साल 1528 में अयोध्या में एक ऐसी जगह पर मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे हिंदू भगवान श्रीराम का जन्म स्थान मानते हैं। कहा जाता है कि मस्जिद मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबर के सम्मान में बनवाई थी, जिसकी वजह से इसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा। इतिहास की बात करें तो माना जाता है कि साल 1528 में अयोध्या में एक ऐसी जगह पर मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे हिंदू भगवान श्रीराम का जन्म स्थान मानते हैं।
अयोध्या विवाद एक राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक विवाद था जो नब्बे के दशक में सबसे ज्यादा उभार पर था। इस विवाद का मूल मुद्दा राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की स्थिति को लेकर है। विवाद इस बात को लेकर था कि क्या हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर वहां मस्जिद बनाया गया या मंदिर को मस्जिद के रूप में बदल दिया गया।
अयोध्या में राम मंदिर बनेगा यह चीफ जस्टिस रंजन गगोई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पांच जजों ने सर्वसम्मति से फैसला दिया था। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा था कि अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर बनेगा। चीफ जस्टिस ने कहा कि ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है। इसके लिए तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट बनाया जाएगा, जो मंदिर बनाने के तौर-तरीके तय करेगी। देश की सबसे बड़ी अदालत ने सबसे बड़े फैसले में अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान का हक माना है। जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया गया है।
आधुनिक भारत के इतिहास में कोई मुक़दमा इतना लंबा और महत्वपूर्ण नहीं चला, जिसने देश की राजनीति, समाज और उसकी समग्र सोच पर गंभीर असर डाला हो। शताब्दियों से चल रहे राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद विवाद का भारत के उच्चतम न्यायालय ने 9 नवंबर 2019 को चालीस दिन की लगातार सुनवाई के बाद फैसला सुना दिया।
प्रभाकर मिश्रा द्वारा लिखित और पेंगुइन हिंदी द्वारा प्रकाशित यह महत्वपूर्ण किताब "एक रुका हुआ फैसला" सुप्रीम कोर्ट में चली उन्हीं चालीस दिनों की सुनवाई का आँखों देखा विवरण है। इस किताब में फैसला सुनाने वाले जजों, संबंधित वकीलों और पक्षकारों की पृष्ठभूमि, मुक़दमे में आए उतार-चढ़ाव और हमारी धर्मनिरपेक्ष न्याय प्रणाली को भी बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रस्तुत किया गया है।
बीते डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग कर रहे प्रभाकर मिश्र अयोध्या विवाद पर आए फैसले से पहले मामले में हुई सुनवाई के चश्मदीद रहे हैं। कानून के छात्र रहे मिश्र ने मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का गहराई से अध्ययन कर उसके महत्वपूर्ण व रोचक पहलुओं को अपनी किताब में कहानी की तरह पेश करने की कोशिश की है।
अयोध्या मामला सुप्रीम कोर्ट में करीब दस साल तक सुनवाई का इंतजार करता रहा।
सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी से अयोध्या केस का क्या संबंध था?
जस्टिस रंजन गोगोई को क्यों कहना पड़ा कि नियत समय में अगर फैसला आ जाता है तो किसी चमत्कार से कम नहीं होगा और जस्टिस गोगोई ने इसे कैसे संभव किया ?
सुप्रीम कोर्ट को क्यों अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करना पड़ा?
'एक रुका हुआ फैसला' पढ़ने पर इन सभी सवालों का जवाब मिल जाता है। प्रभाकर मिश्रा के इस किताब में गहन शोध है, दृष्टांतों का संतुलन है और अदालती फैसले को आम जन की भाषा में समझाने का प्रयास किया गया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में इसके लिए क्या तर्क दिए, यह जानना बहुत दिलचस्प है। पुस्तक में इस पर विस्तार से चर्चा की गई है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट में 'हिंदू तालिबान' की चर्चा क्यों हुई ?
अयोध्या मामले में फैसला सुनाने के पहले कोर्ट को एक और फैसला क्यों सुनाना पड़ा ?
अयोध्या के फैसले से लाहौर के मस्जिद का क्या सम्बंध है ?
लेखक ने ऐसी बहुत सारे ऐसी प्रश्नों को इस पुस्तक में समेटा है, जिससे अयोध्या विवाद को समझने में हमें मदद मिलती है। सुन्नी पक्ष तो शिया पक्ष के वकील की दलीलों को सुनने को ही तैयार नहीं था! हिंदू पक्षकारों में निर्मोही की दलीलें कई बार हिन्दू पक्ष के केस को कमज़ोर करती दिख रही थीं। किताब 'एक रुका हुआ फैसला' ऐसे अनेक अंतर्विरोधों की गहन पड़ताल करती है।
लेखक ने अपने अर्जित भाषा शिल्प से इस पुस्तक में अखाड़ों का इतिहास, उनकी अंदुरूनी राजनीति, अखाड़ों का झांसी की रानी से संबंध और हाशिम अंसारी व महंत रामचंद्र दास की मित्रता का शानदार वर्णन है। साथ ही इस पुस्तक में निहंग सिख, गुरु नानक देव और गुरु गोविंद सिंह का अयोध्या से संबंध और लाहौर की एक मस्जिद और गुरुद्वारे वाले प्रसंग का भी वर्णन है जिसका दृष्टांत सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या केस में फैसला सुनाने वक्त दिया था।
सबसे अहम बात यह है कि यह किताब पाठकों को बताती है कि विवादित भूमि पर सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष को क्यों सही माना और कैसे मुस्लिम पक्ष मुस्लिम शासन काल में ही उस भूमि पर अपने कब्जे को सही तरीके से साबित नहीं कर पाया।
अयोध्या विवाद मामले में रामलला विराजमान को पक्षकार बनाने के पीछे पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सरदार बूटा सिंह की अहम भूमिका थी। इस बात का जिक्र अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर लिखी गई किताब 'एक रुका हुआ फैसला' में किया गया है। अयोध्या विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन जिस रामलला विराजमान को दिया उसे पक्षकार बनाने के पीछे एक रोचक कहानी है।
इसी पुस्तक में आगे जिक्र किया गया है और यह जानना वास्तव में महत्वपूर्ण है कि, कैसे तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित के जरिए विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल को संदेश भेजा था कि हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल किसी मुकदमे में जमीन का मालिकाना हक नहीं मांगा गया है और ऐसे में उनका मुकदमा हारना लाजिमी है।
प्रभाकर मिश्र ने शानदार तरीके से इन सभी घटना क्रम को अपने किताब में लिखा है कि कैसे बूटा सिंह की इस भविष्यवाणी के पीछे एक महत्वपूर्ण तर्क था कि मुस्लिम पक्ष का दावा था कि सदियों से विवादित जमीन उनके कब्जे में रही है। ऐसे में परिसीमन कानून के तहत इतना लंबा समय गुजर जाने के बाद हिंदू पक्षकार विवादित भूमि पर अपना हक नहीं जता सकते थे। इस कानूनी अड़चन को दूर करने के लिए बूटा सिंह ने राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों को देश के पूर्व अटार्नी जनरल लाल नारायण सिन्हा से कानूनी मदद लेने की सलाह दी थी। आंदोलन से जुडे नेता देवकीनंदन अग्रवाल और कुछ लोगों को सिन्हा की राय लेने पटना भेजा गया। इस पुस्तक में अयोध्या विवाद से जुड़ी कानूनी और सियासी पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा किया गया है।
इसी तरह कई अन्य रोचक तथ्यों व प्रसंगों का इस किताब में उल्लेख किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट को एक अहम सबूत माना गया है। एएसआई की रिपोर्ट के साक्ष्यों की महत्वपूर्ण जानकारी भी काफी दिलचस्प है।
अयोध्या विवाद मामले की सुनवाई के दौरान देश में चली सियासत के कारण टलती रही सुनवाई और इस दौरान हुई बयानबाजी भी जिक्र एक रूका हुआ फैसला में किया गया है। किताब में अयोध्या विवाद मामले के संबंध में कई ऐसी जानकारी है जो पाठकों का रुचि बढ़ाती है। मसलन, दुनिया जिस विवाद को श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के नाम से जानती है, सुप्रीम कोर्ट में यह मुकदमा एम सिद्दिकी बनाम महंत सुरेश दास व अन्य के नाम से लड़ा गया।
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आधारित वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर कुमार मिश्र की किताब 'एक रुका हुआ फैसला' में लिखा है कि “अगर रामलला को मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया होता तो फैसला अलग हो सकता था। दरअसल, 1989 से पहले हिंदू पक्ष की ओर से जो भी मुकदमा दायर हुआ था उसमें कहीं जमीन के मालिकाना हक की मांग नहीं थी।“इस पुस्तक में अयोध्या विवाद से जुड़ी कानूनी और सियासी अन्य पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान शिया - सुन्नी तो आमने सामने थे ही, हिंदू पक्षकारों में भी एक राय नहीं थी। कई मौकों पर इनका आपसी विरोध कोर्ट में दिखा।
अगर कभी इस विषय में सोचा हो कि एक फैसले से क्या बदलता है, तो फिर शायद रामजन्मभूमि से जुड़े जमीन विवाद के फैसले के बारे में भी आपने कभी कभी न कभी सोचा होगा। रामजन्मभूमि से जुड़ा फैसला एक ऐसा फैसला था, जिसका आना दशकों से नहीं शताब्दियों से रुका हुआ था। ऐसे में किताब का नाम "एक रुका हुआ फैसला" होना ठीक ही है। किताब की शुरुआत में ही लेखक स्वीकारते हैं कि इस फैसले की रिपोर्टिंग के दौरान कैसे उन्होंने लगातार सोशल मीडिया के जरिये जनता से संवाद बनाए रखा।
पुस्तक के बीच में कुछ तस्वीरें हैं, जिनमें से एक तो उस दिन के अख़बारों के मुख्य पृष्ठों की है, जिस दिन राम जन्मभूमि की जमीन से सम्बंधित फैसला आया था। अदालतों से शीर्ष अदालत तक मुकदमे के तमाम महत्वपूर्ण पहलुओं और पक्षकारों का विवरण भी क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
ये किताब सिर्फ उन चालीस दिनों के बारे में नहीं है जिन चालीस दिनों में सुनवाई लगातार चली। उससे इतर भी कई मुद्दों को किताब छूकर निकलती जाती है। उदाहरण के तौर पर आचार्य रामभद्राचार्य के दोहा शतक के जरिये तुलसीदास के लिखे को प्रमाण के रूप में पेश करने की कोशिश, जो अक्सर किसी सोशल मीडिया पोस्ट में दिखती है, उस मिथक को भी किताब तोड़ देती है।
किताब में यह काफी रोचक जिक्र है कि शीर्ष अदालत के फैसले में पैराग्राफ 786 में मुस्लिम पक्ष का विवादित स्थल पर कब्जे का दावा साबित नहीं होने का जिक्र है। अयोध्या विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के सर्वसम्मत 929 पृष्ठों के फैसले में कुल 806 पैराग्राफ हैं जिनमें 786वें पैराग्राफ में अदालत ने विवादित जमीन पर मुस्लिम पक्ष के कब्जा होने के दावे की विस्तार से समीक्षा की है और यही पैराग्राफ मामले में फैसले का मुख्य आधार है। मुस्लिम पक्ष के लोग सुनवाई के दौरान मीडिया से कम या कहिये नहीं बात कर रहे थे। इस वजह से कभी कभी लगता था कि सुनवाई को एकतरफा कवर किया जा रहा है। लेखक अपने किताब में गंभीरता से यह सब लिखते हैं।
हम जानते हैं कि, अयोध्या मामले में कुल 19 हजार दस्तावेज हैं। इन तमाम दस्तावेजों को इंग्लिश में ट्रांसलेट किया गया है। साथ ही अदालती बहस की कॉपी (प्लीडिंग) पेश की गई है। दीवानी मामले की सुनवाई में ये दस्तावेज और प्लीडिंग अहम होते हैं। जब मामले की सुनवाई शुरू होगी तो एक-एक पक्षकार अपना पक्ष रखना शुरू करेंगे। इस दौरान मुस्लिम पक्षकारों का स्टैंड भी अहम रहा है। क्योंकि जब सुनवाई शुरू हुई थी, तब उनकी ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल ने ये दलील दी थी कि ये आम जमीन विवाद नहीं बल्कि बेहद अहम मामला है और भारतीय राजनीति पर असर रखता है। बीजेपी के घोषणापत्र में अयोध्या में राम मंदिर बनवाने की बात प्रमुखता से थी। लेखक का कानूनी मसले को सरल भाषा में लिखना वाकई कबीले तारीफ है।
देश की शीर्ष अदालत ने करीब चार सौ नब्बे साल पुराने अयोध्या विवाद में बीते साल नौ नवंबर को अपने फैसले में कहा कि अदालत आस्था नहीं बल्कि सबूतों के आधार पर फैसले सुनाती है। मामला मंदिर-मस्जिद से जुड़ा था इसलिए सवाल आस्था का भी था, लेकिन अदालत ने 40 दिनों की नियमित सुनवाई के दौरान किस प्रकार इतने पुराने मामले में साक्ष्यों की जांच की और किस प्रकार सदियों पुराने विवाद का समाधान निकाला, इसे पत्रकार प्रभाकर मिश्र ने इतिहास के आईने में बड़ी रोचकता के साथ कहानी के अंदाज में अपनी किताब एक रूका हुआ फैसला में पेश किया है।
किताब का नाम: एक रुका हुआ फैसला
लेखक: प्रभाकर मिश्र
प्रकाशन: पेंगुइन - हिन्द पॉकेट बुक्स।
मूल्य: 250 रुपये
(समीक्षक आशुतोष कुमार ठाकुर बैंगलोर में रहते हैं। पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं और कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सलाहकार हैं।)
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। योगगुरू बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि आयुर्वेद ने आज कोरोना वायरस से निपटने के लिए एक नई दवा पेश की है। इस दवा का नाम भी कोरोनिल ही है। बाबा रामदेव का कहना है कि यह दवा WHO द्वारा सर्टिफाइड है। नई दवा के लॉन्च के मौके पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी मौजूद रहे। पतजंलि का कहना है कि इस दवा से दुनिया के 158 देशों को कोरोना से निपटने में मदद मिलेगी।
बाबा रामदेव ने कहा कि कोरोनिल की वजह से लाखों लोग कोरोना से ठीक हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस औषधि को बनाने में कोरोना के सभी प्रोटोकॉल को फॉलो किया गया है।
Delhi: Yog Guru Ramdev releases scientific research paper on 'the first evidence-based medicine for #COVID19 by Patanjali'.
— ANI (@ANI) February 19, 2021
Union Health Minister Dr Harsh Vardhan and Union Minister Nitin Gadkari are also present at the event. pic.twitter.com/8Uiy0p6d8d
बता दें कि इससे पहले पतंजलि ने 23 जून 2020 को कोरोना के लिए कोरोनिल लॉन्च की थी, जिसमें 7 दिन में कोरोना के इलाज का दावा किया गया था। हालांकि लॉन्च होने के साथ ही इस दवा को विवादों का सामना करना पड़ा था।
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डिजिटल डेस्क, दिल्ली। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लोगों के लिए दिल्ली डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में कई पदों पर भर्ती निकली हैं। सरकार ने इस बात की जानकारी दिल्ली कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर दी। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और भूतपूर्व सैनिकों के लिए पद आरक्षित है। फिलहाल पदों की संख्या टेंटेटिव है, समय के अनुसार पद घटाए या बड़ाए भी जा सकते है। हालांकि आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो गई है और इच्छुक कैंडिडेट्स 21 फरवरी शाम 5 बजे तक आवेदन कर सकते है। अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से अधिसूची पढ़ें।
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कुल पद: 417
पदों के नाम
महत्वपूर्ण तारीखें
पात्रता एवं योग्यता
आवेदन शुल्क
आयु सीमा (01/01/2021) तक
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। रामचंद्र गुहा हमारे समय के सबसे प्रतितिष्ठित लेखकों में से ऊपर के क्रम में गिने जाने वाले लेखक हैं। राम का पसंदीदा विषय 'क्रिकेट' के प्रति उनका खास दृष्टिकोण रहा है, जिसे वे अपने जादुई भाषा शिल्प में बेहद सरलता से हमारे समक्ष लाते हैं। वह हमें "कामनवेल्थ ऑफ क्रिकेट" किताब के माध्यम से अवगत कराते हैं कि समय के साथ कैसे भारतीय उपमहाद्वीप में इस खेल को आत्मसात किया गया है।
क्रिकेट का साहित्य समृद्ध है। क्रिकेट से सम्बंधित किताबें किसी भी अन्य खेल की तुलना में अधिक समय से हैं। यह पहली बार नहीं है जब गुहा ने क्रिकेट पर कोई किताब लिखी है। क्रिकेट विषय पर 'ए कॉर्नर ऑफ ए फॉरेन फील्ड', और 'स्पिन एंड अदर टर्न्स' उनकी बेहतरीन कृति है।
जब हम एक क्षण के लिए फिर से एक "कार्नर ऑफ अ फॉरेन फील्ड" को देखते हैं, जहां राम ने विस्तार से बताया है कि, 1990 के दशक के शुरुआती वर्ष में कैसे उपमहाद्वीप में औपनिवेशिक खेल की संस्कृति को विकृत करने की शुरुआत हो चुकी थी। यहां गौरतलब है कि यह वही दशक था जिसमें आर्थिक उदारीकरण की योजना और उपग्रह टेलीविजन का भारत में आगमन हो चुका था। यह एक गुजरे हुए समय को याद दिलानेवाला वैचारिक रूप से सुसंगठित पुस्तक है।
किताब की शुरुआत गुहा के जन्मस्थान देहरादून को याद करने के साथ होती है। फिर वे अपने दिल्ली प्रवास और सेंट स्टीफेंस कॉलेज के समय में खेले गए क्रिकेट का जिक्र करते हैं। इसी क्रम में हम उनके चाचा और इस खेल के पहले नायक एन दोरास्वामी से भी मिलते हैं। इस किताब में हमें क्लब और कॉलेज के मैचों के साथ व्यक्तियों, अनगिनित स्मृतियों, घटनाओं, पात्रों, और लेखक के द्वारा देखे गए मैचों के बहुत सारे स्मृतिचित्र एक साथ मिलते हैं। क्रिकेट के साथ राम गुहा के भावनात्मक संबंध का सारांश हमें इस किताब में मिलता है।
'द कॉमनवेल्थ ऑफ क्रिकेट' एक संस्मरण के रूप में शुरू होता है। गुहा इस विषय में बात करते हैं कि उन्होंने क्रिकेट देखना कैसे शुरू किया, कब उन्होंने खेलना शुरू किया, अपने स्कूल और कॉलेज के क्रिकेट के दिनों को बहुत ही संजदिगी से याद करते हैं, जिसे उन्होंने एक खास जुनून के साथ खेला और जिया है। इस पुस्तक में वह अपने अद्भुत समरण शक्ति से इस खेल से संबंधित घटनाओं,व्यक्तित्वों, उपाख्यानों (जो हमेशा तथ्यों से बंधे नहीं होते हैं) और अपने गृह राज्य कर्नाटका टीम के साथ-साथ अपने जीवन से सबंधित पक्षों को लेकर का एक शानदार आख्यान बुनते हैं। कुछ बिंदु पर यह पुस्तक एक व्यापक कैनवास को चित्रित करती है, गुहा अपने अनुभवों जिसमें उनका क्रिकेट के इतिहास ज्ञान, अपने पसंदीदा क्रिकेटरों, उनसे मिलने के उपरांत के संस्मरणों के विषय में जो तथ्य साझा करते हैं, वह वास्तव में हमें आनंदित करता है।
मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद सामाजिक असमानता खतरनाक रूप से बढ़ गई थी। कश्मीर में उग्रवाद अपने चरम पर था। राजनीतिक रूप से भी ये अस्थिर समय था। वर्ष 1989-1998 के दौरान देश में सात अलग-अलग प्रधानमंत्री बने थे। रामचंद्र गुहा किताब में लिखते हैं, "नफरत, संदेह और भय और हिंसा के इस माहौल में सचिन तेंदुलकर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपना पहला शतक बनाया। उनके बल्लेबाजी के कौशल और बहुमुखी प्रतिभा ने लाखों भारतीयों को अस्थायी रूप से अपनी रोजमर्रा की चुनौतिओं को कम कर दिया।"
यदि आप क्रिकेट की किताबों के विषय में जानते हैं, तो आपको इस बात की जानकारी होगी कि अब तक जो भी लिखा गया है उसमें अधिकांश संस्मरण, क्रिकेट इतिहास और उसकी संस्कृति का विवरण, महान खिलाड़ियों की जीवनी अथवा आत्मकथा, स्कूल, क्लब, राज्य और राष्ट्रीय टीमों के पसंदीदा खिलाड़ियों के उपाख्यानों, समकालीन क्रिकेट के मुद्दों पर टिप्पणी मात्र है। इन सब विषयों पर सी.एल.आर.जेम्स अपनी ऐतिहासिक कृति “अबाउट बियॉन्ड ए बाउंड्री” में विस्तार से लिखते हैं।
कई भारतीय लेखकों ने भी क्रिकेट पर बेहतर लिखा है। इनमें से कुछ ने इस विषय पर अपनी दृष्टि के साथ लिखने की कोशिश की है, यथा राजन बाला और मुकुल केसवन इस क्रम में प्रमुख नाम हैं। इस प्रकार के पुस्तकों में से अधिकांश रोचक और सूचनात्मक हैं, लेकिन राम गुहा की किताब, उन सबसे बेहतर है। जो पाठक गुहा को पढ़ते आए हैं उन्हें आश्चर्य नहीं होगा। गुहा के लिए यह किताब उनके लिए एक गुरु की आज्ञा है, जिसे उन्होंने बेहद खूबसूरती से लिखा है।
हम जानते हैं कि गुहा तीन दशक से अधिक समय से क्रिकेट पर बेबाक अंदाज में लिखते रहे हैं। यह नई पुस्तक एक व्यक्तिगत यात्रा की तरह है, जो हर लिहाज से आधुनिक भारतीय क्रिकेट की यात्रा भी है, जिसमें 1971 में इंग्लैंड पर जीत से लेकर 1983 और 2011 में आईपीएल से लेकर विश्व कप की जीत तक का सफर शामिल है। उनकी सहानुभूति हमेशा की तरह उन लोगों के साथ थी जिन्हें उन्होंने भारतीय क्रिकेट के निर्माण में अपना योगदान दिया है। गुहा क्रिकेट पर अधिकार के साथ लिखते हैं।
इस किताब में गुहा अपने पसंदीदा पाकिस्तानी क्रिकेटरों के विषय में विस्तार से लिखते हैं। जावेद मियांदाद पर इसमें एक लंबा लेख है। गुहा एक शानदार संस्मरण का भी उल्लेख करते हैं जिसमें उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के कोपेनहेगन में एक पाकिस्तानी क्रिकेट प्रशंसक के साथ एक सुंदर और लंबी बातचीत की है। मुझे किताब के उस हिस्सों से व्यक्तिगत जुड़ाव जैसा है, जिसमें गुहा कुछ ऐसे क्रिकेट खिलाडियों के बारे में बात करते हैं, जो मेरे इस खेल के समझ के विकास होने से पहले ही रिटायर हो चुके थे। मुझे खुशी हुई जब मैंने कीथ मिलर को समर्पित एक अनुभाग पढ़ा, जो मेरे पसंदीदा क्रिकेटर में से एक हैं। विजय हजारे पर भी एक लेख है जो बेहतरीन तरीके से लिखा गया है। आप गुहा के इस कृति को पढ़ते हुए यादों के समन्दर में डूबते हैं और आप उन्हें याद करते हुए बार-बार भावनात्मक होते हैं।
गुहा का सचिन तेंदुलकर वाला अध्याय थोड़ा खींचा गया है, इसके बावज़ूद, किताब सुंदर और परिपूर्ण है। इस कथा में बिशन सिंह बेदी और ईएएस प्रसन्ना के स्पिन मंत्रमुग्ध करता है, गुंडप्पा विश्वनाथ या विजय हजारे की आकर्षक बल्लेबाजी के रूप में यह हमें एक जादू की दुनिया में ले जाता है।
रामचंद्र गुहा हमारे समय के अग्रगण्य इतिहासकार, पर्यावरण विषय के शानदार लेखक के साथ एक गंभीर राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। पर जब बात क्रिकेट की आती है तो वह अभी भी इस प्रिय खेल के अपने नायकों के साथ एक सेल्फी के लिए उत्साहित रहते है। देहरादून की उनकी यादों के केंद्र में क्रिकेट का खेल, असंख्य प्रकार के पेड़ों से घिरे मैदान और पहाड़ी राम गुहा की समृतियों में अभी भी जीवंत है। शायद यही वह जुड़ाव है, जिसने उन्हें कटुता से मुक्ति दिलाई, जिसका उन्हें BCCI के अल्पकालिक प्रशाशनिक कायर्भार के समय उन्हें सामना करना पड़ा था।
पुस्तक के अंतिम अध्याय में, जिसमें गुहा दार्शनिक विलियम जेम्स को 'वेराइटीज ऑफ क्रिकेटिंग चौविनिज्म' कहकर एक संकेत देते हैं (विलियम जेम्स ने 'द वेराइटीज ऑफ रिलिजियस एक्सपीरियंस') नामक एक पुस्तक लिखी, वह कहते हैं, "क्रिकेट की दो मौलिक धुरी हैं: राष्ट्रवाद और पीढ़ी। प्रत्येक क्रिकेट प्रशंसक लगभग बिना किसी अपवाद के पैदा होता है, और अधिकांश क्रिकेट प्रशंसक उसे कभी नहीं विस्मृत करते हैं ।"
क्रिकेट का सबसे परिष्कृत रूप टेस्ट क्रिकेट है और बाकी वास्तव में बकवास है। टेस्ट क्रिकेट सिंगल माल्ट व्हिस्की है जबकि एकदिवसीये (50-50) क्रिकेट भारतीय-निर्मित विदेशी शराब है तथा आईपीएल सड़क के नीचे बिकने वाला देशी शराब है। आईपीएल क्रिकेट एक ऐसी ही लत है, इसलिए लोग अडिक्ट की तरह इसे देखते हैं, लेकिन उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता है। यह नशीली दवाओं की ख़राब लत की तरह है। रामचन्द्र गुहा, गंभीरता से यह सब बताते हैं!
क्रिकेट फैन होने के कारण को जानने के लिए, यह एक बेहतरीन किताब है। जब आप पढ़ेंगे तो आपको यह एहसास होगा कि गुहा जब अपने खुद के अनुभवों को हमारे समक्ष रखते हैं तब यह हमरे लिए यह एक आइना दिखाने का काम करते हैं। हम एक ही समय में बार-बार मुग्ध और विस्मित होते हैं। एक प्रशंसक, खिलाड़ी, लेखक, विद्वान और प्रशासक के रूप में, रामचंद्र गुहा ने क्रिकेट के साथ बेहद भावनात्मक जीवन बिताया है। लेखक राम गुहा "कामनवेल्थ ऑफ़ क्रिकेट' के रूप में इस महान खेल "क्रिकेट के इतिहास और वर्तमान का समाजशात्रीय विश्लेषण के साथ एक शानदार और दीर्घकालिक महत्व का पुस्तक लिखा है।
क्रिकेट पर गुहा की इससे पहली किताब 2004 में आई थी, एक लंबे अंतराल के बाद उन्होंने इस विषय पर यह पुस्तक लिखा है। मुझे और उनके सभी चाहने वालों को उम्मीद है कि यह क्रिकेट पर उनकी आखिरी किताब नहीं है। गुहा की नई पुस्तक क्रिकेट के खेल का सामाजिक इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में याद किया जायेगा।
पुस्तक समीक्षा: कामनवेल्थ ऑफ क्रिकेट - रामचंद्र गुहा
प्रकाशक: हार्पर कॉलिंस
भाषा: अंग्रेजी
मूल्य: रु 559
(समीक्षक,आशुतोष कुमार ठाकुर बैंगलोर में रहते हैं। पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं और कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सलाहकार हैं।)
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डिजिटल डेस्क, भोपाल। अगर आप सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे है और अपना करियर मेडिकल फील्ड में बनाना चाहते है, तो मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) आपके लिए खुशखबरी लेकर आया है। MPPSC ने मेडिकल ऑफिसर के पदों भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। ऑनलाइन आवेदन जमा करने की प्रक्रिया 15 फरवरी 2021 से शुरू होगी। इसके लिए आवेदन करने के इच्छुक अभ्यर्थी लोक सेवा आयोग की आधिकारिक वेबसाइट www.mppsc.nic.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। इन पदों पर आवेदन करने की आखिरी तारीख 14 मार्च 2021 है।
एमपीपीएससी भर्ती की महत्वूपर्ण तिथियां
योग्यता
आयु सीमा
आवेदन शुल्क
आधिकारिक वेबसाइट - www.mppsc.nic.in
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डिजिटल डेस्क, जयपुर। राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) ने राजस्थान पुलिस में सब इंस्पेक्टर की कुल 857 वैकेंसी निकाली हैं। इन पदों पर भर्ती के लिए आवेदन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई हैं। अगर आप भी वर्दी पाने की चाहत रखते है और इन पदों के लिए आवेदन करना चाहते हैं तो यहां हम आपको बताते हैं इससे जुडी महत्वपूर्ण बातें...
इन पदों के लिए नोटिफिकेशन 3 फरवरी को जारी किया गया था। वहीं, अब आवेदन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इच्छुक उम्मीदवार इन पदों के लिए 10 मार्च तक आयोग की वेबसाइट rpsc.rajasthan.gov.in या एसएसओ पोर्टल sso.rajasthan.gov.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं।
आयु सीमा
आवेदक की न्यूनतम आयु 20 वर्ष से अधिकतम आयु 25 वर्ष निर्धारित की गई है।बता दें कि आवेदक की आयु की गणना 1 जनवरी 2022 से की जाएगी।
शैक्षणिक योग्यता
किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से किसी भी विषय में ग्रेजुएट होना आवश्यक हैं। वहीं, इन पदों के लिए फाइल ईयर के स्टूडेंट्स भी आवेदन कर सकते हैं।
आवेदन शुल्क
GEN/EWS/OBC - 350 रूपये
BC/OBC(Non Creamy Layer ) - 250 रुपये
SC/ST/PWD - 150 रुपये
परीक्षा का पैटर्न
इन पदों के लिए लिखित परीक्षा,शारीरिक दक्षता एंव साक्षात्कार के माध्यम से चयन किया जाएगा।लिखित परीक्षा (ऑनलाइन/ऑफलाइन) में objective प्रश्न होगें।वहीं परीक्षा का सिलेबस जल्द ही आय़ोग की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाएगा।
कैसे करें आवेदन
आवेदन करने के लिए एसएसओ पोर्टल sso.rajasthan.gov.in पर जाएं। यहां login करने के बाद आपको होम पेज में दिए गए रिक्रूटमेंट सेक्शन में जाना होगा। फिर रिक्रूटमेंट पोर्टल पर क्लिक कर एसआई भर्ती के अप्लाई पर क्लिक करना होगा।जिसके बाद फॉर्म खुल जाएगा।यहां आपको आवेदन फॉर्म भरकर शुल्क भुगतान करें। फिर आवेदन का फाइनल सबमिशन करें।
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डिजिटल डेस्क, दिल्ली। देश की सेवा करने हेतु भारतीय नौसेना में भर्ती के सपने देखने वाले छात्रों के लिए एक अच्छी खबर है। भारतीय नौसेना की आधिकारिक वेबसाइट पर भारतीय नेवल एकेडमी, केरल, में चार साल के बीटेक डिग्री कोर्स के लिए आवेदन जारी किए हैं। चुने गए उम्मीदवारों को भारतीय नौसेना के कार्यकारी और तकनीकी ब्रांच के बीच आईएनए में अपना कोर्स पूरा करने के लिए बांटा जाएगा। आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इच्छुक कैंडिडेट्स 9 फरवरी तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं, ज्यादा जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से अधिसूची पढ़ें।
अधिक जानकारी के लिए यहां क्लिक करें- http://davp.nic.in/WriteReadData/ADS/eng_10701_7_2021b.pdf
आधिकारिक वेबसाइट
https://www.joinindiannavy.gov.in/
कुल पद: 26
महत्वपूर्ण तारीखें
पात्रता एवं योग्यता
आवेदन शुल्क
सभी उम्मीदवारों के लिए कोई आवेदन शुल्क नहीं है केवल ऑनलाइन आवेदन पत्र भरें।
केवल JEEMAIN 2020 के स्कोर कार्ड उम्मीदवार ही ऑनलाइन आवेदन कर सकते है।
आयु सीमा
साल 02/01/2002 से 01/07/2004 तक के बीच का जन्म।
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डिजिटल डेस्क, दिल्ली। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए उत्तर प्रदेश सरकार एक सौगात लाई है। यूपी सरकार ने ACF / RFO के पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। फिलहाल इन पदों पर प्री एग्जाम के लिए सभी कैडिडेट्स नोटिफिकेशन भेजा गया है। बता दें कि आवेदन प्रकिया शुरू हो गई है। इच्छुक कैंडिडेट्स 2 मार्च तक आवेदन कर सकते है। प्री एग्जाम और एडमिट कार्ड उपलब्ध होने की तारीख जल्द ही सूचित की जाएगी। ज्यादा जानकारी के लिए आवेदक इस लिंक के माध्यम से अधिसूची पढ़ें।
http://uppsc.up.nic.in/View_Enclosure.aspx?ID=109&flag=E&FID=607
कुल पद : 16
महत्वपूर्ण तारीखें
पात्रता एवं योग्यता
आवेदन शुल्क
आयु सीमा (01/07/2021) तक
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डिजिटल डेस्क, दिल्ली। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए एक अच्छी खबर है। मध्यप्रदेश के आर्मी वार कॉलेज एमएचओडब्ल्यू में कुछ पदों पर भर्तियां जारी की है। इस बात की जानकारी वॉर कॉलेज ने नोटिफिकेशन जारी कर के दी। आवेदन करने की प्रकिया शुरू हो चुकी है। इच्छुक कैंडिडेट्स 22 फरवरी तक आवेदन कर सकते है। अभ्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि, रोज़गार पत्रिका को स्टडी कर के ही आवेदन भेजें। चयन प्रक्रिया - लिखित, स्किल टेस्ट, फिजिकल, प्रैक्टिकल और टाइपिंग टेस्ट के आधार पर होगी। कैंडिडेट्स अपने सिलेबस में जनरल इंटेलिजेंस एंड रीजनिंग, सामान्य जागरूकता, अंग्रेजी भाषा और संख्यात्मक योग्यता ज़रुर पढ़ें।
कुल पद: 39
खाली पदों के नाम व संख्या
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सिनेमा प्रोजेक्शनिस्ट / विडियो ऑपरेटर / मैकेनिक / मिक्सर / फोटोग्राफर |
01 |
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आशुलिपिक श्रेणी - II |
01 |
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अवर श्रेणी लिपिक |
10 |
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सिविलियन मोटर ड्राइवर (सामान्य ग्रेड) |
04 |
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बिजली मिस्त्री |
01 |
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रसोइया |
02 |
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इश्तेहार निर्माता |
01 |
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स्टाफ (प्रहारी) |
04 |
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स्टाफ (सफाईवाला) |
02 |
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स्टाफ (माली) |
01 |
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नाई |
01 |
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फटिगमेन |
01 |
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पर्यवेक्षक |
01 |
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ओवरसियर |
01 |
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साइकिल फिटर |
01 |
महत्वपूर्ण तारीखें
पात्रता एवं योग्यता
चयन प्रक्रिया
आवेदन शुल्क
आयु सीमा
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