डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्रदोष व्रत के बारे में लगभग सभी लोग जानते हैं। सनातन धर्म में प्रदोष व्रत का महत्त्व वार के हिसाब से अलग-अलग होता है। यानी कि यदि यह सोमवार को आता है तो सोम प्रदोष और शुक्रवार को आए तो शुक्र प्रदोष। फिलहाल इस बार यह रविवार 30 अगस्त को है, इसलिए इसे रवि प्रदोष व्रत कहा गया है। प्रदोष व्रत कैलाश निवासी भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। आज प्रदोष व्रत में महिलाओं ने भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना की।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रविवार को आने वाला यह प्रदोष व्रत स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही उत्तम माना गया है। इस व्रत को करने वाले की स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएं दूर होती हैं और स्वास्थ्य में सुधार होकर व्यक्ति सुखपूर्वक अपना जीवन-यापन करता है। आइए जानते हैं रवि प्रदोष व्रत के बारे में...
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पूजा सामग्री
एक जल से भरा हुआ कलश, एक थाली (आरती के लिए), बेलपत्र, धतूरा, भांग, कपूर, सफेद पुष्प व माला, आंकड़े का फूल, सफेद मिठाई, सफेद चंदन, धूप, दीप, घी, सफेद वस्त्र, आम की लकड़ी, हवन सामग्री।
पूजा विधि
रवि प्रदोष व्रत के रखने के बाद शिवजी का पूजन करना चाहिए। उपवास करने वालों को इस पूरे दिन निराहार रहने के साथ दिनभर मन ही मन शिव का प्रिय मंत्र 'ॐ नम: शिवाय' का जाप करना चाहिए। इसके बाद सूर्यास्त के पश्चात पुन: स्नान करके भगवान शिव का षोडषोपचार से पूजन करना चाहिए।
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रवि प्रदोष व्रत की पूजा का संध्या समय 4.30 से शाम 7.00 बजे के बीच उत्तम रहता है, इसलिए इस समय पूजा की जानी चाहिए। नैवेद्य में जौ का सत्तू, घी एवं मिश्री का भोग लगाएं, तत्पश्चात आठों दिशाओं में 8 दीपक रखकर प्रत्येक की स्थापना कर उन्हें 8 बार नमस्कार करें। इसके बाद नंदीश्वर (बछड़े) को जल एवं दूर्वा खिलाकर स्पर्श करें। शिव-पार्वती एवं नंदकेश्वर से प्रार्थना करें।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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