डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि का अपना विशेष महत्व होता है, लेकिन भाद्रपद माह की अमावस्या की अपनी ही विशेषता हैं। इस अमावस्या को कुशग्रहणी या पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है। इसे भादों अमावस्या भी कहते हैं। हिंदू धर्म में अमावस्या के दिन पितृ तर्पण करने का विधान है। मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन अपने घर के पितृ देवताओं को याद करके उनके निमित्त दान आदि करते हैं। उनके घर-परिवार से पितृदोष खत्म हो जाता है।
भाद्रपद मास की अमावस्या को भगवान श्री कृष्ण को समर्पित माना जाता है। शास्त्रानुसार, भाद्रपद अमावस्या के दिन पवित्र नदी अथवा जलकुंड में स्नान करना चाहिए। अमावस्या पर दान-स्नान का बहुत महत्व माना गया है। इसलिए इस दिन प्रातःकाल की बेला में किसी पवित्र नदी, कुंड में स्नान करना चाहिए, और सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए।
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महत्व
भाद्रपद माह की अमावस्या पर धार्मिक कार्यों के लिए कुश (एक प्रकार की घास) एकत्रित की जाती है। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि धार्मिक कार्यों में या विशेष रूप से श्राद्ध कर्म आदि करने में उपयोग की जाने वाली घास यदि इस दिन एकत्रित की जाए तो वो वर्षभर तक पुण्य फलदायी होती है।
कुश एकत्रित करने के कारण ही इसे कुशग्रहणी अमावस्या कहा जाता है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में वैसे इस अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है। कहा जाता है इस अमावस्या पर उखाड़ा गया कुश एक वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है। हिन्दू धर्म शास्त्र में कुश को बहुत ही शुद्ध और पवित्र माना गया है।
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वैसे ही अगर आपको कुश को उखाड़ना है तो इसके लिए कुछ नियम होते हैं जिनका प्रयोग किया जाना चाहिए। कुश का महत्व श्राद्ध करने के लिए या श्राद्ध पक्ष में बहुत बढ़ जाता है और आप उन्हें इन नियम से उखाड़ सकते हैं। प्रातः प्रथम स्नान करें और शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करें, इसके बाद आप भूमि से कुश उखाड़ सकते हैं। कुश उखाड़ते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व की ओर रखें। पहले 'ॐ' का उच्चारण करें फिर कुश को स्पर्श करें इसके बाद ये मंत्र पढ़ सकते हैं।
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Source From
RACHNA SAROVAR
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